व्यवसायिक अर्थशास्त्री की परिभाषा भूमिका और दायित्व

 व्यावसायिक अर्थशास्त्री
 (Business Economist)

Business questions

सर्वोच्च प्रबन्ध द्वारा आर्थिक लागतों में सलाह-मशविरा करने के लिए एक विशिष्ट अधिकारी की नियुक्ति की जाती है जिसे प्रबन्धकीय या व्यावसायिक अर्थशास्त्री कहा जाता है। 

इसके द्वारा सही निर्णय लिये जाने और भावी नियोजन की कठिन समस्याओं का समाधान करने में प्रबन्ध को पर्याप्त सहायता मिलती है। यही कारण है कि गत वर्षों में व्यवसाय के क्षेत्र में व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों का महत्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है। 

व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों की नियुक्ति बड़ी-बड़ी फर्मो, औद्योगिक संस्थाओं, बीमा कम्पनियों व बैंकों आदि में की जा रही है। इन अर्थशास्त्रियों का महत्व धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। 

व्यवसायिक अर्थशास्त्री की भूमिका व महत्व 

व्यावसायिक जगत की अधिकांश समस्याओं का समाधान अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के द्वारा ही सम्भव है। 

यही कारण है कि आज के व्यवसाय जगत में व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों का महत्व बढ़ता जा रहा है। उदाहरणार्थ - हम उत्पादन के नियम की सहायता से ही उत्पादन की मात्रा या इकाई का अनुकूलतन आकार निर्धारित कर पाते हैं। मूल्य निर्धारण में माँग का नियम, माँग की लोच, सीमान्त उपयोगिता का नियम एवं उपभोक्ता की बचत आदि का सहारा लेना पड़ता है। 

इसी प्रकार व्यवसाय की लाभ देय माता का निर्धारण करने में अनिश्चितता वहन करने का सिद्धान्त, जोखिम का सिद्धान्त एवं लाभ के आधुनिक सिद्धान्त आदि का विश्लेषण करना पड़ता है। 

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि व्यावसायिक समस्याओं का अनिश्चितताओं का पूर्वानुमान लगाकर जोखिमों को कम कर सकता है। करने वाले तत्वों को निम्न दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। समाधान करने के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान अति आवश्यक है। 

एक कुशल एवं योग्य व्यावसायिक अर्थशास्त्री व्यावसायिक अनिश्चितता का पूर्वानुमान लगाकर जोखिमों कम कर सकता है। व्यवसायिक अर्थशास्त्र का महत्व इसलिए और भी बढ़ गया है 

क्योंकि वह प्रबंधकीय कार्यों को प्रभावित करने वाले तत्वों को निश्चित करता है और उसके लिए अपने सुझाव भी देता है निर्णय को प्रभावित करने वाले तत्वों को निम्न दो भागों में विभक्त किया गया है

1. आन्तरिक घटक (Internal Factors) - फर्म के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले या प्रबन्धकों के नियन्त्रण में होने वाले घटक, आन्तरिक घटक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- एक फर्म या संस्था को इस बात की स्वतन्त्रता होती है 

कि वह अपनी पूँजी कहाँ और कितनी विनियोजित करे, कितने श्रमिकों को काय पर लगाए, वस्तु का क्या मूल्य निर्धारित करे तथा वस्तुओं का विक्रय कहाँ पर करे। इस सम्बन्ध में एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री प्रबन्धकों को अपनी सलाह देकर उन्हें सही निर्णय लेने में सहायता प्रदान कर सकता है।

जो कि निम्न प्रकार हो सकती है. 
(i) उत्पादन एवं विक्रय का लक्ष्य, 
(ii) लाभ की मात्रा
(iii) विनियोग नीति
(iv) नकद कोष की सीमा
(v) कोषा का उपयोग
(vi) श्रमिकों की समस्यायें
(vii) विज्ञापन एवं विपणन आदि। 

2. बाह्य घटक (External Factors) - फर्म के कार्यक्षेत्र से बाहर रहने वाले एवं प्रबन्धक के नियन्त्रण में न रहने वाले घटक, बाह्य घटक कहलाते हैं। 

इसके अन्तर्गत वे घटक आते हैं जो व्यावसायिक दशाओं को निश्चित करते हैं। इन तत्वों को वातावरण सम्बन्धी घटक भी कहा जाता है क्योंकि ये सामान्य व्यावसायिक दशाओं का निर्माण करते हैं और प्रत्येक व्यावसायिक कार्य को प्रभावित करते हैं। 

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इन घटकों का अध्ययन तथा ध्यान सदैव रखना चाहिए तथा इनका विश्लेषण करके उनके प्रभावों से सर्वोच्च प्रबन्ध को अवगत कराते रहना चाहिए। 

अतः नीतियों के निर्धारण में निम्न तत्वों का समावेश करना अति आवश्यक है - 
(i) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भविष्य कैसा है ? 
(ii) प्रतियोगिता घटने या बढ़ने की क्या सम्भावनाएँ हैं ? 
(iii) विश्वव्यापी, क्षेत्रीय तथा स्थानीय आर्थिक प्रवृत्तियाँ क्या हैं ? (iv) पूँजी की लागत, ब्याज की दर तथा लाभ-दर बढ़ेगी या कम होगी? 
(v) उत्पादन पर अमिक आन्दोलन का क्या प्रभाव होगा ? 
(vi) व्यापार चक्रों की गति क्या होगी? 
(vii) सरकार की आर्थिक नीति क्या होगी? 
(viii) विदेशी व्यापार के सन्तुलन का क्या प्रभाव होगा? 

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के दायित्व

प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री के दायित्व (Responsibilities of Managerial Economist) 


व्यावसायिक अर्थशास्त्री के प्रमुख दायित्व निम्नलिखित हैं 

1. विनियोजित पूँजी पर समुचित लाभ (Reasonable Profit on Capital Employed) - प्रत्येक व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभार्जन करना होता है। एक प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री का यह दायित्व है कि वह संस्था के लाभों को अधिकतम करने का पूर्ण प्रयत्न करे। 

संस्था को यथासम्भव प्रयास करे। पर्याप्त लाभ दिलाने में उसका यह दायित्व बनता है कि वह संस्था के लाभों को अधिकतम करने के लिए 

2. आर्थिक सूचना के स्रोतों एवं विशेषज्ञों से सम्पर्क (Contacts with the Sources of Economic Information and the Experts) - व्यावसायिक अर्थशास्त्री को जिन व्यक्तियों व संस्थाओं से अपनी फर्म को प्रभावित करने वाली सूचनाएं मिलती हैं, उसे उन व्यक्तियों व संस्थाओं से निरन्तर सम्पर्क बनाए रखना चाहिए। 

इसके अतिरिक्त उसे अपने विषय के विशेषज्ञों से परिचय और उनके बारे में सम्पूर्ण जानकारी रखनी चाहिए। व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह दायित्व है कि वह विभिन्न स्रोतों से सूचनाएँ एकत्र करके प्रबन्ध तंत्र को अवगत करावे । 

3. सफल पूर्वानुमान (Successful Forecasts) – प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री की कुशलता उसके पूर्वानुमानों की शुद्धता पर निर्भर करती है। भविष्य अनिश्चित होता है जिसके कारण व्यवसाय में जोखिम बढ़ने की सम्भावना होती है। 

अतः प्रबन्धकीय अर्थशास्त्री का यह दायित्व बनता है कि वह प्रबन्ध को व्यवसाय सम्बन्धी सही पूर्वानुमान प्रस्तुत करें जिससे व्यवसाय की अनिश्चितताओं का निदान हो सके। तभी व्यवसाय की जोखिमों का निदान भी सम्भव है। उसकी सफलता उसकी शुद्धता में निहित है। अतः उसे अपने पूर्वानुमानों को शुद्धतम बनाए रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। 

उसे व्यापार चक्रों और व्यवसाय की प्रवृत्ति पर भी ध्यान देना चाहिए तथा व्यवसाय की विभिन्न क्रियाओं के सम्बन्ध में परावर्तन बिन्दुओं से प्रबन्ध को सतर्क करना चाहिए । व्यावसायिक अर्थशास्त्री द्वारा प्रबन्ध के पूर्वानुमानों की सूचना देने के पश्चात यदि उसको यह पता चलता है।

कि उसके द्वारा दी गयी सूचनाएँ त्रुटिपूर्ण हो उस इस मास की जानकारी प्रबन्ध को देनी चाहिए जिससे कि प्रबन्ध अपनी भावी नीतियों एवं कार्यक्रमों में समुचित समायोजन कर सके। 

4. संस्थान में सम्मानजनक स्थान बनाना (Respectable Status in the Organisation) - एक अर्थशास्त्री को संस्थान में उपयुक्त स्थान बनाना चाहिए। यह अपने कार्यो की सही रुप तभी प्रदान कर सकता है जबकि प्रबन्ना को इसकी आवश्यकता हो।

उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह प्रबन्ध को किस सीमा तक प्रभावित करता है। उसे प्रबन्ध से निकटतम सम्पर्क स्थापित करने के लिए सरल एवं बोधगम्य भाषा में सूचनाएं प्रदान करनी चाहिए। प्रबन्ध द्वारा उसकी बात अस्वीकृत किए जाने पर उसका महरच निरन्तर कम होने लगता है। 

व्यावसायिक अर्थशासी को चाहिए कि वह उच्च प्रबन्ध को अपनी बातें समझाने का प्रयास करें। उसे संस्थान की आवश्यकता का अनुरुप गूचनाए शीघ्र देनी चाहिए। 

 व्यावसायिक अर्थशास्त्र के आधारभूत उद्देश्य  
(Basic Objectives of Business Economics) 


व्यावसायिक अर्थशास्त्र के आधारभूत उद्देश्य निम्नलिखित हैं : 

1. उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधनों को जुटाना (Acquiring of Resources for the Attainment of Objectives) -   निश्चित समय के भीतर प्राप्त करने का प्रमुख उद्देश्य है। लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए साधनों को जुटाकर उन्हेंं निश्चित समय के भीतर प्राप्त करने का मुख्य उद्देश्यय है। 

2. प्रबन्ध को त्रुटियों के प्रति सचेत करना (Warning the Management for Errors Prediction) - व्यावसायिक अर्थशास्त्र का प्रमुख उद्देश्य यह है कि वह प्रबन्ध को उन सभी त्रुटियों के प्रति शीघ्र ही सचेत कर दे जो पूर्वानुमान लगाने में हो गयी है। उसके इस व्यवहार से संस्था हानि से बच सकती है और अपनी गलतियों को सुधार सकती है। 

3. विनियोजित पूँजी पर उचित लाभ-दर को कायम रखना (To Maintain Reasonable Rate for Profit on Invested Capital) - व्यावसायिक अर्थशास्त्री को सदैव इस बात का ध्यान रखना होगा कि व्यवसाय में लगी पूँजी घर लाभ की दर में वृद्धि होती रहे। यदि लाभ दर घटने की किसी प्रकार की आशंका हो तो उससे बचने के लिए शीघ्र उपाय किए जाने चाहिए। 

4. प्रतिपुष्टि तथा नियन्त्रण (Feedback and Control) - किसी निर्णय को कार्य रूप दिए जाने के समय इसका यह प्रमुख उत्तरदायित्व बनता है कि वह उन निर्णय के प्रभावों का मूल्यांकन करे व सूचनाओं तथा आँकड़ों के माध्यम से उन पर पूर्ण नियन्त्रण करके नियन्त्रण प्रक्रिया को चालू रखे। 

5. सफल पूर्वानुमान (Successful Forecast) - व्यावसायिक अर्थशास्त्र का प्रमुख आधुनिक तकनीकों को लगाना चाहिए जो भविष्य को स्पष्ट बना सके। उद्देश्य सफल पूर्वानुमान लगाना है। किसी भी योजना या निर्णय की सफलता इस बात में निहित है कि पूर्वानुमान किस सीमा तक सही है। अतः पूर्वानुमान लगाने मे से उन सभी सांख्यिकीय, गणितीय तथा आधुनिक तकनीकों को लगाना चाहिए जो भविष्य को स्पष्ट बना सकें।

6. आर्थिक सूचनाओं के स्रोतो का ज्ञान तथा विशेषज्ञों से सम्पर्क (Knowledge of Sources of Information and Contacts with Experts)- व्यावसायिक अर्थशास्त्री को विशेषताओं से सम्पर्क करना होगा जो उसे उददेश्य पूर्ति की सलाह दे सके। तभी वह अपने उददेश्यों को उन सभी स्रोतों का ज्ञान करना होगा जिनके आधार पर आर्थिक घटनाओं की जानकारी हो सके तथा उन सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है।

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