सम्प्रेषण की परिभाषा उद्देश्य तथा महत्व

Definitions of Communication
(Definitions of Communication) 


सम्प्रेषण क्या है ? परिभाषा उद्देश्य तथा महत्व - 

यदि एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भेजे गये संदेश को नहीं समझ पाता है या समझने में असफल रहता है तो इसे सम्प्रेषण नहीं कहा जा सकता है। 

जैसे यदि उपक्रम का अध्यक्ष वार्षिक सामान्य सभा में अंग्रेजी भाषा में भाषण देता है तथा कोई भी व्यक्ति अंग्रेजी नहीं समझता, तो इसे सम्प्रेषण नहीं कहा जा सकता। 

सम्प्रेषण प्रबन्धकों के हाथों में एक प्रभावपूर्ण हथियार होता है। इसके माध्यम से कार्पोरेट जगत में कार्य सम्पन्न होते हैं। सम्प्रेषण का व्यावसायिक एवं औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है। वर्तमान समय में सम्प्रेषण के बिना व्यावसायिक विकास की कल्पना करना व्यर्थ है। व्यावसायिक जगत् में। 

नैगमिक सम्प्रेषण व्यक्ति के शरीर में होने वाले रक्त संचार की भाँति महत्वपूर्ण है। नैगमिक क्षेत्र में, सुव्यवस्थित सम्प्रेषण पद्धति अपनाकर व्यवसाय प्रचालन में तीव्रता लायी जा सकती है। यदि व्यावसायिक प्रगति को तीव्र करना हो तो सम्प्रेषण आवश्यक होगा। 
वर्तमान संचार क्रान्ति की स्थिति में व्यावसायिक उद्यमों की सफलता बहुत कुछ उचित सम्प्रेषण पर निर्भर करती है। आज के इस गतिशील व्यावसायिक पर्यावरण में सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाना अपरिहार्य है। 

नैगमिक सम्प्रेषण में व्यावसायिक संस्था या उसके सदस्य विचारों, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं, समंकों का आदान-प्रदान करते हैं | उद्योग, वाणिज्य एवं व्यापार के आन्तरिक एवं बाह्य सम्बन्धों का सृजन सम्प्रेषण प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। व्यावसायिक उन्नति के अनुरूप सम्प्रेषण की महत्ता बढ़ती जाती है। 

सम्प्रेषण की परिभाषाएँ 

(Definitions of Communication) 


विभिन्न विद्वानों ने सम्प्रेषण को अग्रवत परिभाषित किया है - लुईस ए. ऐलन के अनुसार, ' संचार उन सब क्रियाओं का योग है जिनको एक व्यक्ति अपनी विचारधारा को दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में पहुँचाने हेतु या उसे समझाने हेतु अपनाता है। इसके अन्तर्गत कहने सुनने तथा समझाने की व्यवस्थित एवं नियंत्रित गतिविधियों का समावंश होता है।' 

संचालकों को प्रशिक्षण देने वाली अमेरिकी समिति के अनुसार, "अच्छा सम्प्रेषण विचारों का आदान-प्रदान है अथवा पारम्परिक समझदारी, विश्वास तथा अच्छे मानवीय सम्बन्धों की स्थापना हेतु सूचना न्यूमैन एवं समर के अनुसार, “सम्प्रेषण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य तथ्यों, विचारों, सम्मतियों अथवा भावनाओं का विनिमय है। .

थियो हेमैन के अनुसार, "सम्प्रेषण एक-दूसरे के मध्य सूचना एवं समझदारी बनाये रखने की प्रक्रिया है। 

कीथ डेविस के अनुसार, “सम्प्रेषण एक-दूसरे के बीच सूचना प्रदान करने व समझने की प्रक्रिया है। 

पीटल लिटिल के अनुसार, "सम्प्रेषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सूचनाओं के भेजने से व्यक्तियों या संगठनों के मध्य समझदारी पनप सके।' 

अमेरिकन प्रबन्ध संगठन के अनुसार, “व्यक्ति के किसी भी व्यवहार का प्रतिफल सूचनाओं के आदान-प्रदान से है। उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि सम्प्रेषण एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से दो या अधिक व्यक्ति तथ्यों, विचारों, सम्मतियों या भावनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। सम्प्रेषण सुनने, बोलने तथा समझने की निरन्तर प्रक्रिया है। 

(Essential Elements of Business Communication)
व्यावसायिक सम्प्रेषण के आवश्यक तत्व 


सम्प्रेषण के आवश्यक तत्व

1. संदेश (Message) : संदेश या सूचना सम्प्रेषण का प्रमुख (key) तत्व है। एक संदेश होना आवश्यक है। यह लिखित या भाषिक हो सकता है। संदेश सूचना, अनुरोध या आदेश के रूप में हो सकता है। 

2. सम्प्रेषक या सम्प्रेषणकर्ता या भेजने वाला (Communicator or Sender) : सूचना का भेजने वाला होना आवश्यक है। प्रेषक एक ऐसा व्यक्ति है जो कुछ संदेश प्रेषित करने की इच्छा रखता है। 

3. सम्प्रेषिती या प्रेषिती या सम्प्रेषणग्रहीता या पाने वाला (Communicatee or Receiver) : सूचना का प्राप्तकर्ता होना आवश्यक है। यह वह व्यक्ति होता है जिसके पास संदेश पहुँचाया जाता है। 

4. संदेश का समझना (Understanding of Message) : यदि सम्प्रेषिती संदेश को नहीं समझता तो सम्प्रेषण नहीं होता। 

5. प्रतिपुष्टि (Feed Back) : संदेश के लिए प्रतिपुष्टि आवश्यक है। प्राप्तकर्ता संदेश का प्रत्युत्तर देता है। प्रत्येक सम्प्रेषण में कुछ क्रिया-प्रतिक्रिया या प्रतिपुष्टि होती है। 

सम्प्रेषण की प्रकृति बताइये 

 सम्प्रेषण की प्रकृति (Nature of Communication) सम्प्रेषण की प्रकृति का वर्णन निम्नलिखित रूप में किया गया है - 

1. व्यापक कार्य (Pervasive Function) : व्यवसाय के सभी क्षेत्रों में सम्प्रेषण आवश्यक होता है। 
जैसे - (i) निदेशन, (ii) नियोजन, (iii) चयन, प्रशिक्षण व मूल्याँकन, (iv) कार्य, उत्तरदायित्व व प्राधिकार के बारे में सूचना, (v) नियंत्रण | सम्प्रेषण व्यवसाय के सभी प्रबन्धकीय कार्यों में महत्वपूर्ण है। यह सभी व्यवसाय क्षेत्रों के लिए आवश्यक है। 

2. निरन्तर प्रक्रिया (Continuous Process) : संदेशों, विचारों व सम्मतियों का निरन्तर प्रसार उसी प्रकार से आवश्यक है, जिस प्रकार से मानव शरीर में रक्त का निरन्तर चलते रहना आवश्यक है। 

3. द्वि-मार्गीय प्रक्रिया (Two-way Process) : यह दो व्यक्तियों के मध्य अर्थ के एक पुल के रूप है। यह बोलने, सुनने व समझने की विधिवत् व निरन्तर प्रक्रिया है। लुइस ए. एलन के अनुसार सम्प्रेषण उन समस्त बातों का योग है जिन्हें एक व्यक्ति उस समय करता है जबकि वह किसी अन्य व्यक्ति के मस्तिष्क में कुछ समझाना चाहता है। जार्ज आर. टैरी के अनुसार, "प्राप्तकर्ता के प्रत्युत्तर पर ध्यान दिये बिना साधारण रूप से बात करना या लिखना गलतफहमी को बढ़ाता है। सम्प्रेषण तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक कि प्राप्तकर्ता संदेश को नहीं समझता। द्विमार्गीय सम्प्रेषण प्रतिपुष्टि द्वारा सम्भव होता है। सम्प्रेषण में सम्प्रेषक संदेश को भेजता है तथा प्राप्तकर्ता का प्रत्युत्तर वापस प्राप्त होता है। द्विमार्गीय सम्प्रेषण अधिक सटीक होता है क्योंकि प्रतिपुष्टि प्रेषक को संचार को सुधारने की आज्ञा देती है। द्विमार्गीय प्रक्रिया में प्राप्तकर्ता का आत्मविश्वास अधिक होता है। द्विमार्गीय सम्प्रेषण से ध्रुवीकरण होने की संभावना रहती है। 

4. आपसी समझदारी (Mutual Understanding) : सम्प्रेषण के लिए आपसी समझ होनी चाहिए। यह सम्बन्धों को विकसित करने तथा इन्हें बनाये रखने में यह एक यंत्र की भाँति है। 

5. सभी सम्प्रेषण का ढाँचागत होना (All Communication is Structured) सम्प्रेषण का प्रत्येक भाग संदेश-संरचना के प्रारूप का विश्लेषण करता है तथा व्यवसाय के लिए उपयोगी सूचना निकालता है। 

6. बातचीत की भाँति (Conversational) : सभी सम्प्रेषण प्रकृति से बातचीत की तरह हैं। 'सूक्ष्म, व 'स्थूल, सम्प्रेषण ढाँचे में दो स्तर होते हैं। 

7. अन्य विशिष्टियाँ (Other Features) : ये निम्नलिखित हैं - (i) सम्प्रेषण हेतु समुचित माध्यम की आवश्यकता होती है। (ii) यह मानसिक सक्षमता के सेतु की भाँति होता है। (iii) सम्बन्ध विकसित करने में यंत्र की भाँति होता है। सम्प्रेषण की शर्तों व उद्देश्यों को बताइये। 

उत्तरसम्प्रेषण की शर्ते
 (Conditions of (ommunication) 


सम्प्रेषण निम्नलिखित स्थितियों में ही सम्भव होता है - 

1. सम्प्रेषक में सूचना देने की इच्छा का होना, 
2. सम्प्रेषिती का उपस्थित होना, 
3. सम्प्रेषिती में संदेश को समझने की क्षमता होना, 
4. सम्प्रेषिती में संदेश का उत्तर देने की क्षमता न होना। 

सम्प्रेषण के उद्देश्य 
(Objectives of Communication) 

सम्प्रेषण के अग्रांकित उद्देश्य होते हैं - 
1. उचित तथा पर्याप्त सूचना देना, 
2. व्यापारिक गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित करना, 
3. प्रबन्धकीय क्षमता का विकास करना, . 
4. नीतियों को लागू करना, 
5. संगठनात्मक उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद देना, 
6. मानवीय व अन्य स्रोतों को संगठित करना,
7. कर्मचारियों का मनोबल ऊपर उठाना, 
8. विचारों का कार्यान्वयन करना, 
9. उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि करना, 
10. द्वि-मार्गीय सम्प्रेषण प्रक्रिया को स्थापित करना, 
11. सभी स्तरों पर विचारों तथा सुझावों को प्राप्त करना, 
12. कर्मचारियों के विकास व उन्नति के लिए तथ्यों व आँकड़ों को प्रस्तुत करना, 
13. मधुर मानवीय सम्बन्ध स्थापित करना, 
14. संगठन में किसी भी प्रकार के परिवर्तन हेतु उचित वातावरण तैयार करना, 
15. कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रयास करना, तथा 
16. आदेशों व निदेशों का अन्तरण करना। 

 समग्र सम्प्रेषण (Whole Communication) 

समग्र सम्प्रेषण अत्यन्त फैला हुआ एवं विस्तृत सम्प्रेषण होता है। इसमें सम्प्रेषण की भावनार्य, मूल्य व विचार शामिल होते हैं। 
1. तथ्य (Facts) : ऐसी घटनाएँ जो व्यक्ति के अनुभव पर निर्भर करती हैं। 
2. भावनायें (Feelings) : भावना किसी समय या स्थिति विशेष में मानसिक क्रिया, प्रतिक्रिया व अभिव्यक्ति है। सम्बन्धित होते हैं। 
3. मूल्य (Values) : ये परिवर्तनीय विचार हैं। ये व्यक्ति की संस्कृति, सभ्यता व समाज से भी कह सकते हैं। 
4. मनोवृत्ति (Attitude): किसी समय या दशा विशेष में अपनाया गया दृष्टिकोण है। इसे मत समग्न या सम्पूर्ण सम्प्रेषण माना जाता है। जब किसी सामान्य सम्प्रेषण प्रक्रिया के तत्वों में उपरोक्त चार तत्व शामिल हो जाते हैं 

आत्मविकास हेतु मार्गदर्शन करने वाली बातें 
(Guiding Things for Self-development) 

आत्म-विकास हेतु निम्नलिखित मार्गदर्शन दिए जा सकते हैं - 

1. अवबोधन में परिवर्तन करें (Change in Perception) - चूंकि हम अपनी समस्या को उसी स्तर की सोच से नहीं बदल सकते जिस स्तर की सोच से हमने इसे सृजित किया है। अतः समस्या का समाधान करने हेतु हमें अपना अवबोधन बढ़ाकर अपनी सोच को बदलना चाहिए। 

2. दिमाग का सर्वोत्तम उपयोग करें (Make Best use of Brain) - आत्म विकास कार्य को सर्वोत्तम तरीके से करने के लिए दिमाग को निर्देशित करता है। जब दिमाग के विभिन्न संकाय ठीक से उपयोग किये जाते हैं तो पूर्ण सामन्जस्य में कार्य होता है। 

3. उत्तरदायी एवं अधिक सक्रिय बनें (Be Responsible and Proactive) - हमें अति सक्रिय रूप से अपने उत्तदायित्वों को पूर्ण करना चाहिए। हमारी अपनी स्वतन्त्र इच्छा, जागरूकता, कल्पना-शक्ति होती है जिनसे हमें अधिक गतिशील बनना चाहिए। अति सक्रिय होने के लिए हमें अधिक जागरूक होना चाहिए। 

4. कुशलतापूर्वक योजना बनायें तथा समय प्रबन्धन करें (Plan Consciously and manage Time) - जीवन में सफल होने के लिए स्पष्ट ध्येय हो। इससे आपमें दीर्घकाल तक धैर्य व अपने ध्येय के प्रति लगन रहेगी। अपना लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद हमें उपायों की योजना बनानी चाहिए। 

5. सीखना कभी बन्द न करें (Never stop Learning) - शिक्षा एवं अधिगम पर समय एवं संसाधनों को खर्च करना अच्छा निवेश होता है। यह भविष्य में अच्छा प्रत्याय देता है। आय अर्जित करने लगने पर भी सीखना बन्द न करें। 

6. वर्तमान में रहें (Live in the Present) - आत्म-विकास के लिए हमें प्रतिक्रिया रहित जागरूकता के लिए प्रयास करना चाहिए। इसलिए पुरानी यादों अथवा भावी कल्पनाओं में जीने के बजाय वर्तमान में रहना चाहिए। आत्म-विकास के लिए अन्य व्यक्तियों को स्वीकार करना चाहिए तथा उनका सम्मान करना चाहिए। आत्म-विकास हेतु उत्कृष्ट मूल्यों का सृजन करना चाहिए।