सांख्यिकी अनुसंधान के अर्थ प्रकार और आयोजन विधि – sankhyiki anusandhan

सांख्यिकीय अनुसंधान से आप क्या समझते हैं ! इसका आयोजन किस प्रकार होता है?

Sankhyiki anusandhan

सांख्यिकीय अनुसंधान का आशय (Meaning of Statistical Investigation) 

सांख्यिकीय अनुसंधान से आशय उन क्रियाओं से लगाया जाता है जो किसी क्षेत्र के संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करने में सांख्यिकीय रीतियों के द्वारा सम्पन्न की जाती हैं। 

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जब ज्ञान की खोज सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग करके संख्यात्मक तथ्यों के आधार पर की जाती है तो इस क्रिया को सांख्यिकीय अनुसंधान कहते हैं। सांख्यिकीय अनुसंधान आंकड़ों के संग्रहण एवं विश्लेषण की प्रक्रिया होती है। 

अन्य शब्दों में, गणितीय तथ्यों के विश्लेषण द्वारा जानकारी पाना सांख्यिकीय अनुसंधान कहलाता है। सांख्यिकीय अनुसंधान का कार्य गणितीय तथ्यों के संकलन से या सांख्यिकीय सर्वेक्षण के माध्यम से किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त किये गये ऑफड़ों का परिणाम पाने हेतु विश्लेषण किया जाता है। 

संक्षेप में सांख्यिकीय अनुसंधान का आशय क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित गणितीय तथ्यों के सम्बन्ध में सांख्यिकीय विधियों का सहायता से जानकारी करने से है। सांख्यिकीय अनुसंधान का कार्य विभिन्न तथ्यों के बारे में सूचनाएँ संकलित करने तथा आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों की समस्याओं को हल करने हेतु किया जाता है। 

सांख्यिकीय अनुसंधान की प्रक्रिया लम्बी होती है तथा यह एक तकनीकी कार्य है। सांख्यिकीय अनुसंधान प्रक्रिया में अन्तिम रिपोर्ट तैयार करने तक कई कदम जैसे - जाँच का नियोजन. करना, आँकड़ों का संकलन करना, सम्पादन करना, आँकड़ों को प्रस्तुत करना, विश्लेषण करना, निर्वचन करना, रिपोर्ट तैयार करना आदि उठाए जाते हैं। 

सांख्यिकीय अनुसंधान के प्रमुख चरण :-

संख्यिकीय अनुसंधान के मुख्य चरण (Main Stages of Statistical Investigation) साधारणतया किसी अनुसंधान में निम्नलिखित प्रमुख चरण शामिल किये जाते हैं- 

1. अनुसंधान का आयोजन - सांख्यिकीय अनुसंधान के प्रथम चरण में अनुसंधान के उद्देश्य, क्षेत्र, प्रकृति, सूचना के स्रोत, इकाइयों का निर्धारण, संकलन रीति एवं समय निर्धारण कर लिया जाता है। 

2. समंकों का संकलन - सांख्यिकीय अनुसंधान द्वितीय के चरण में अनुसंधान योजना बना लेने के बाद समंकों के संग्रहण की विभिन्न विधियों का विवेचन करके उचित रीति द्वारा समंकों को एकत्र किया जाता है। 

3. प्रश्नावली व अनुसूची को तैयार करना - समंकों का संकलन करने के बाद सही सूचना प्राप्त हो सके इस दृष्टि से सूचना प्रदान करने वाले से पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची तैयार कर ली जाती है। 

4. संकलित समंकों का सम्पादन - समंकों को एकत्र कर लेने के बाद समंकों का परीक्षण किया जाता है और यदि उसमें कोई अशुद्धि हो तो उसे दूर करके समंकों में यथोचित संशोधन किये जाते है। 

5. समंकों का वर्गीकरण एवं सारणीयन - समंकों का सम्पादन करने के बाद समंकों को विभिन्न वर्गों एवं श्रेणियों में बांटा जाता है। समंकों का वर्गीकरण करने के बाद सारणियाँ बनाई जाती हैं। प्रस्तुत किया जाता है। 

6. समंकों का प्रस्तुतीकरण - इसके उपरान्त माध्यों, चित्रों व बिन्दु-रेखाओं द्वारा समंकों को 

7. समंकों का विश्लेषण - समंकों के प्रस्तुतीकरण के बाद विभिन्न सांख्यिकीय मापों द्वारा शामिल किया जाता है। उनका विश्लेषण किया जाता है। विश्लेषण के कार्य में माध्य, अपकिरण, विषमता, सहसम्बन्ध निकालना 

8. समंकों का निर्वचन करना - समंकों का विश्लेषण करने के बाद उचित एवं निष्पक्ष निष्कर्ष निकाला जाता है। पर अंतिम रिपोर्ट तैयार करना। 

9. अन्तिम प्रतिवेदन तैयार करना - अनुसंधान क्रिया का अन्तिम चरण है निष्कर्ष के आधार प्रश्न 

सांख्यिकीय अनुसंधान का आयोजन (Planning of Statistical Investigation)  :-

 संकलन से पूर्व अनुसंधान का आयोजन करते समय निम्नलिखित बातों पर विचार कर लेना चाहिए -

1. उद्देश्य और क्षेत्र (Object and Scope) - किसी भी अनुसंधान को प्रारम्भ करने से पहले उसका उद्देश्य एवं क्षेत्र निश्चित कर लेना चाहिए जिससे कि समंकों के संकलन तथा उनके विश्लेषण आदि की क्रियाओं में कोई कठिनाई न हो। उद्देश्य निर्धारित करने में कुछ विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। 

उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जिसके अनुसार कार्य करने पर समय एवं धन की बचत हो और अनुसंधान कार्य सुचारु रूप से किया जा सके। अनुसंधान का उद्देश्य सामान्य या विशिष्ट हो सकता है। सामान्य उद्देश्य रखने वाले अनुसंधान सर्वसाधारण के लिये उपयोगी होते हैं। 

विशिष्ट उद्देश्य रखने वाले अनुसंधान प्रायः छोटे पैमाने पर किये जाते हैं। इसलिये इनकी उपयोगिता एक विशेष वर्ग तक सीमित रहती है। अनुसंधान को राजनैतिक क्षेत्र, आर्थिक क्षेत्र और प्राकृतिक क्षेत्रों में बांटा जा सकता है। 

2. संरचना के स्रोतों का निर्धारण (Determination of the Sources of Information) - सूचना का स्रोत प्राथमिक हो सकता है या द्वितीयक हो सकता है। प्राथमिक समंक वे कहे जाते हैं जो अनुसंधानकर्ता द्वारा मौलिक रूप से एकत्र किये जाते हैं!

और जो समंक किसी प्रक्रिया के अन्तर्गत पहले से उपलब्ध हैं उन्हें द्वितीयक समंक कहते हैं। प्रो. नीस्वैगर के अनुसार, 'प्राथमिक स्रोत वे प्रकाशन हैं जिनमें समंकों का प्रकाशन उसी संस्था द्वारा किया जाये जिसने उनका संकलन व विश्लेषण किया है! 

द्वितीयक स्रोत सर्मक प्रस्तुत करने वाले वे प्रकाशन हैं जिनका संकलन अन्य संस्थाओं ने किया है तथा जिनके लिये दूसरे लोग उत्तरदायी हैं।' 

इन समकों का संकलन निम्नलिखित अनुसंधानों के माध्यम से किया जाता है - 

1. प्रयोग अथवा सर्वेक्षण अनुसंधान 
2. संगणना का निदर्शन अनुसंधान 
3. गोपनीय अथवा प्रकट अनुसंधान 
4. प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अनुसंधान 
5. मौलिक अथवा पुनरावृत्ति अनुसंधान 
6. व्यापक अथवा सीमित अनुसंधान 
7. नियमित अथवा सामयिक अनुसंधान। 

3. सांख्यिकीय इकाइयों का निर्धारण (Determination of Statistical Units)- किसी भी वस्तु को मापने का एक पैमाना होता है उसी के आधार पर उस वस्तु को मापते हैं। जैसे दूध को लीटर से, लम्बाई को मीटर से नापा जाता है ठीक उसी प्रकार सांख्यिकीय इकाइयों के माध्यम से अनुसंधानकर्ता तथ्यों को मापता है। 

सांख्यिकीय इकाई को अनुसंधान प्रारम्भ करने से पूर्व ही निश्चित कर लेना चाहिए। सांख्यिकीय इकाई को परिभाषित करते हुए प्रो. किंग ने कहा है कि यह केवल उचित ही नहीं बल्कि आवश्यक है कि इकाई की परिभाषा त्रुटिरहित की जाये। 

भ्रम को दूर करने तथा समंकों में एकरूपता लाने के लिये इकाई की व्याख्या करना आवश्यक होता है। इकाइयों की व्याख्या करना तब और भी आवश्यक हो जाता है जबकि इकाइयाँ गुणात्मक प्रकृति की हों तथा उनका कोई प्रमाणित अर्थ न हो। 

4. समंक संकलन की विधियाँ (Methods of Collecting Data) - समंक संकलन की अनेक विधियों में जो उपयुक्त हो उन्हें प्रयोग में लाया जा सकता है। प्राथमिक सामग्री की निम्नलिखित विधियाँ हैं - 

(1) प्रत्यक्ष व्यक्तिगत रीति 

(2) अप्रत्यक्ष व्यक्तिगत रीति 

(3) स्थानीय साधनों द्वारा अनुमान 

(4) डाक द्वारा अनुसूची भेजकर सूचना प्राप्त करना 

(5) संगणकों द्वारा अनुसूची करवाना। 

5. शुद्धता की मात्रा का निर्धारण (Determination of Degree of Accuracy) - सांख्यिकीय अनुसंधान करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि शुद्धता की मात्रा कितनी रखी जाये। पूर्ण शुद्धता को सांख्यिकीय अनुसंधानों में न तो प्राप्त किया जा सकता है और न ही इसे आवश्यक माना जाता है 

इसलिए यथोचित शुद्धता के लक्ष्य को ही प्राप्त करना चाहिए। समस्या की प्रकृति, अनुसंधान का उद्देश्य व क्षेत्र, उपलब्ध साधनों आदि को ध्यान में रखकर शुद्धता के स्तर को निश्चित किया जाता है। इस सम्बन्ध में प्रो. किंग ने लिखा है 

कि प्रत्येक सांख्यिकीय समस्या के लिए प्रत्येक पद के विषय में शुद्धता का एक निश्चित स्तर पहले से ही निर्धारित कर लेना चाहिए और इस बात का पूरा प्रयत्न होना चाहिए कि प्रत्येक लिखित तथ्य इस स्तर तक शुद्ध हो परन्तु इस स्तर का उच्चतम शुद्धता के समकक्ष होना सदा आवश्यक नहीं है।' 

6. प्रश्नावली की रचना (Designing of Questionnaire) - अनुसंधान के विषयों का निर्धारण हो जाने के बाद उससे सम्बन्धित जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्नावली की रचना की जाती है। प्रश्नावली में ऐसे प्रश्नों का निर्माण किया जाता है 

जिनका उत्तर सरलता से दिया जा सके। प्रश्न बना लेने के बाद अनुसूची तैयार कर ली जाती है। संतोषप्रद अनुसूची की रचना करना सरल कार्य नहीं है। इस कार्य के लिए किसी अनुभवी व्यक्ति से सेवाएं ली जाती हैं। इसकी रचना में हर तरह की सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। 

7. प्राप्त सामग्री का सम्पादन (Editing of Materials) - समंकों का सम्पादन करना मूल कार्य है। सम्पादन की समस्या सामग्री संकलित करने के बाद आती है। सम्पादन के कार्य के लिए एक व्यक्ति भी नियुक्त किया जा सकता है। 

यदि अनुसंधान कार्य बड़ा है तो इस कार्य के लिए एक से अधिक व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सकती है। सम्पादन करते समय कुछ संख्याओं के उपसादन करने की आवश्यकता होती है। 

सूचना को क्रमबद्ध करना, प्रविष्टियों की जाँच करना, कोड नम्बर डालना, गुणक ज्ञात करना, योग लगाना एवं वर्गीकरण करना इत्यादि क्रियाओं को सम्पादन में शामिल किया जाता है। यदि समंकों का सम्पादन सही होगा तो सारणियाँ ठीक बनेंगी और निष्कर्ष सही निकलेंगे। 

8. समंकों की व्यवस्था (Organising of Data) - समंकों का सम्पादन करने के पश्चात् उनको व्यवस्थित किया जाता है ताकि उन्हें सारणियों में प्रविष्ट किया जा सके। यदि अनुसंधान बड़ा है तो यान्त्रिक सारणीयन की आवश्यकता पड़ती है। 

9. विश्लेषण करना (Analysis) - सारणियाँ बन जाने के बाद सामग्री का विश्लेषण किया जाता है। विश्लेषण करने के बाद जो निष्कर्ष प्राप्त होता है उसे रिपोर्ट में लिख दिया जाता है। रिपोर्ट संक्षिप्त एवं निष्पक्ष होना चाहिए।

इस लेख में हमने आपको सांख्यिकी अनुसंधान की परिभाषा बेहद सरल शब्दों में बता दिया जिससे विद्यार्थियों को या याद करने में सरलता रहेगी सांख्यिकी अनुसंधान का आयोजन किस प्रकार किया जाता है यह भी परीक्षा में पूछे जाने वाला प्रश्न है हमने इसे भी सरलता पूर्वक समझा दिया है।