फाइटर प्लेन के चालक, अलग तरह का सूट क्यों पहनते हैं?

 कभी भी आप भारतीय वायुसेना (IAF) के किसी फाइटर पायलट को देखते होंगे तो आपकी नजर उसके उस हरे रंग के जी-सूट पर जरूर जाती होगी जो जेट उड़ाने के समय वह पहने होता है. जी-सूट के बिना दुनिया का कोई भी फाइटर पायलट जेट नहीं उड़ा सकता है. जी-सूट न सिर्फ फाइटर पायलट बल्कि हर अंतरिक्ष यात्री के लिए जरूरी होता है. आज हम आपको बताते हैं कि क्‍या होते हैं ये जी-सूट और कैसे काम करते हैं. साथ ही यह भी जानिए कि क्‍यों जी-सूट के बिना जेट या फिर अंतरिक्ष यान उड़ाना खतरनाक हो सकता है.



क्‍या है जी-सूट का इतिहास

जी-सूट यानी Gravity Suit और पहली बार सन् 1917 में इस तरह के किसी आउटफिट की जरूरत महसूस हुई थी. उस समय कई ऐसे केस सामने आए थे जिसमें पायलट्स बेहोश हो गए थे. इसके बाद सन् 1931 में सिडनी यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर फ्रैंक कॉटन ने मानव शरीर में गुरुत्‍वाकर्षण के केंद्र के निर्धारण की बात कही. इसके बाद यह जानना संभव हो सका कि जब शरीर गति के दबाव में आता है जो किस तरह से इस केंद्र में बदलाव होते हैं. कॉटन ने सन् 1940 में एंटी-ग्रैविटी सूट या जी-सूट की जरूरत पर बल दिया और उस समय ब्रिटेन में युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी. इस बात का अनुमान लगाया गया कि 30 प्रतिशत पायलट ऐसे हैं जिनकी मृत्‍यु दुर्घटना में होती है और जिसमें ब्लैक आउट जैसी वजह भी शामिल होती है.


क्‍यों है जरूरी

जी-सूट का मकसद उड़ान के समय खून के बहाव को नियंत्रित रखना है. भारतीय वायुसेना में सुखोई जैसे फाइटर जेट को उड़ा चुके एक फाइटर पायलट ने बताया कि आखिर जी-सूट किसी फाइटर पायलट के लिए क्‍यों जरूरी है. पायलट के मुताबिक जमीन पर साधारणतौर पर 1G (गुरुत्‍वाकर्षण बल) का अनुभव होता है (g गुरुत्‍वाकर्षण बल को मापने की ईकाई है). सामान्‍य तौर पर एक इंसान 3g तक का गुरुत्‍वाकर्षण बल झेल सकता है और एक फाइटर क्रू 4g से 5g तक का गुरुत्‍वाकर्षण बल झेलने में सक्षम होते हैं. फाइटर पायलट को इतना बल झेलने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. लेकिन जब बल इससे ज्‍यादा होता है तो फिर किसी भी पायलट के लिए मुश्किल बढ़ सकती है.

जी-सूट कैसे करता है मदद

जी फोर्स ज्‍यादा होने पर खून का बहाव दिल से आगे नहीं हो पाता है. यह भी हो सकता है कि खून सिर्फ पैरों में या फिर टखने में ही जमा हो जाए. अगर खून जमा हो जाता है तो फिर पायलट बेहोश हो सकते हैं और उनकी जान भी जा सकती है. ऐसे में मस्तिष्‍क तक खून का बहाव होता रहे. जी-सूट की वजह से खून का बहाव दिल से मस्तिष्‍क तक होता रहता है. जी-सूट के बाद फाइटर पायलट 9जी और इससे ज्‍यादा मात्रा का गुरुत्‍वाकर्षण बल झेल सकते हैं. जी-सूट दरअसल पैरों में नसों को नियंत्रित करता है.

कितना होता है वजन और क्‍यों होती है पॉकेट

एक स्‍टैंडर्ड जी-सूट का वजन साधारणतौर पर 3 से 4 किलोग्राम होता है. आईएएफ पायलट के मुताबिक उच्‍च स्‍तर पर जी फोर्स की जरूरत काफी होती है क्‍योंकि तब आप जेट का पूरा प्रयोग करके दुश्मन के फाइटर जेट को ढेर कर सकते हैं. जी-सूट में मौजूद पॉकेट की भी फाइटर पायलट के लिए काफी अहमियत है. इस पॉकेट में पायलट उड़ान के समय अपनी जरूरी चीजें जैसे दस्‍ताने, डॉक्‍यूमेंट्स रख सकते हैं. एक लेदर पॉकेट इसलिए होती है ताकि पायलट आपातकालीन स्थिति के लिए हथियार जैसे चाकू आदि रख सके.

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